म्यांमार: स्वतंत्रता दिवस पर 6,186 कैदियों की रिहाई का ऐलान, चुनाव प्रक्रिया के बीच सैन्य सरकार का महत्वपूर्ण कदम

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जेल की सलाखों के पीछे हथकड़ी लगाए कैदी का हाथ, म्यांमार में स्वतंत्रता दिवस पर कैदियों की रिहाई से जुड़ा प्रतीकात्मक चित्र
म्यांमार में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर घोषित कैदियों की रिहाई को दर्शाता प्रतीकात्मक दृश्य।

म्यांमार की सैन्य सरकार ने जेल में बंद कैदियों को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर रिहा करने की बड़ी घोषणा की है । सरकारी मीडिया की रिपोर्ट अनुसार कुल 6,186 कैदियों को माफी के तहत रिहा किया जाएगा । 

म्यांमार के सरकारी टीवी न्यूज़ चैनल के द्वारा यह खबर सामने आ रही है यहां इस साल चुनाव होने वाला है चुनावी माहौल को देखते हुए सैन्य सरकार ने 6,186 कैदियों को रिहा करने का फैसला लिया है जिसमें 52 विदेशी नागरिक भी शामिल है । 

इसके साथ जंटा सरकार ने कैदियों के रिहा करने की घोषणा करते हुए कहा कि देश में सजा काट रहे पहले से कुछ कैदियों के सजा का एक छठा हिस्सा कम किया जाएगा । 

और यह राहत हत्या, बलात्कार, आतंकवाद, भ्रष्टाचार और हथियार व ड्रग्स से जुड़े गंभीर अपराधों में दोषी पाए गए लोगों पर लागू नहीं होगी । 

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस माफी के तहत किसी राजनीतिक कैदी को रिहा किया जाएगा या नहीं ।

आपको बता दे की आंग सान सू की की चुनी हुई सरकार को सत्ता से 2021 में सेना के द्वारा इसे सत्ता से हटा दिया गया था तब से म्यांमार राजनीतिक और सामाजिक जैसे गंभीर मुद्दों से गुजर रहा है । 

फिलहाल आंग सान सू की फिलहाल 27 साल की जेल की सजा काट रही हैं। उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) को भारी बहुमत से जीत के बावजूद भंग कर दिया गया था। 

म्यांमार के मानव अधिकार एसोसिएशन  फॉर असिस्टेंस टू पॉलिटिकल प्रिजनर्स के द्वारा जारी किए गए एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार तख्तापलट के बाद से अब तक 30,000 से अधिक लोगों को राजनीतिक आरोपों में हिरासत में लिया जा चुका है

इन सभी मुद्दों को लेकर देश में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं नए प्रतिरोध समूहों और पुराने जातीय सशस्त्र संगठनों और सेना के बीच झड़प होने से अब तक 36 लाख लोग अपना घर छोड़कर दूसरे जगह पलायन कर चुके हैं । 

इस बीच, पिछले सप्ताहांत म्यांमार में 2020 के बाद पहली बार चुनाव का पहला चरण संपन्न हुआ। हालांकि, विपक्षी दलों, संयुक्त राष्ट्र और कई पश्चिमी देशों ने इन चुनावों को “दिखावा” करार दिया है। उनका कहना है कि जंटा विरोधी राजनीतिक दलों को चुनाव से बाहर रखा गया है और चुनाव की आलोचना करना गैरकानूनी बना दिया गया है। 

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